नहाय खाय से शुरू हुआ छठ पूजा (Chhath Puja), जानिए पूरी तिथि और कथा
वैदिक पंचांग के अनुसार, छठ पूजा (Chhath Puja) 2025 की शुरुआत 25 अक्टूबर से नहाय खाय के साथ हो चुकी है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है और 36 घंटे का निर्जला व्रत सबसे कठिन माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि छठ मैया की पूजा से संतान सुख, पारिवारिक शांति और समृद्धि प्राप्त होती है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, छठी मैया प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई थीं। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियंवद और रानी मालिनी की संतानहीनता के बाद देवी षष्ठी की आराधना से पुत्र की प्राप्ति हुई। तभी से छठ पूजा परंपरा शुरू हुई।

छठ पूजा 2025 की शुरुआत: नहाय खाय के साथ आरंभ हुआ लोक आस्था का महापर्व
वैदिक पंचांग के अनुसार, छठ पूजा 2025 (Chhath Puja 2025) की शुरुआत 25 अक्टूबर से नहाय खाय के साथ हो चुकी है। यह महापर्व सूर्य उपासना और शुद्ध आस्था का प्रतीक माना जाता है। अगले चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में महिलाएं और पुरुष 36 घंटे का निर्जला व्रत रखकर सूर्यदेव और छठ मैया की पूजा करते हैं।
छठ मैया की उत्पत्ति और धार्मिक महत्व
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि निर्माण के बाद देवी प्रकृति ने स्वयं को छह भागों में विभाजित किया। छठा अंश देवी षष्ठी या छठी मैया के रूप में जाना गया। इन्हें मानस पुत्री कहा जाता है और संतान की रक्षा व दीर्घायु के लिए पूजित किया जाता है। हिंदू परंपरा में बालक के जन्म के छठे दिन इनकी पूजा का विधान है।
छठ पूजा की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियंवद और रानी मालिनी संतान न होने से दुखी थे। ऋषि कश्यप की सलाह पर उन्होंने यज्ञ किया, जिसके फलस्वरूप मृत पुत्र की प्राप्ति हुई। दुखी राजा ने प्राण त्यागने का निर्णय लिया, तभी कन्या देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने कहा कि वे प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हैं और षष्ठी कहलाती हैं। राजा ने उनकी पूजा की और जीवित पुत्र प्राप्त किया। तभी से छठ पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई।
कब है खरना और अर्घ्य का समय
इस वर्ष 26 अक्टूबर 2025 को खरना (Kharna 2025) होगा, जब व्रती गुड़-चावल का प्रसाद ग्रहण करते हैं। 27 अक्टूबर को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और 28 अक्टूबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर छठ पूजा का समापन होगा।
आस्था और लोक संस्कृति का संगम
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और दिल्ली समेत देशभर में छठ पूजा का विशेष महत्व है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि लोक संस्कृति, शुद्धता और आत्मसंयम का अद्भुत प्रतीक भी है।


